आत्मबल बढ़ाने के लिये सहनशीलता का तप परम आवश्यक

Dharmendra Seth 



 जौनपुर

 आत्मबल बढ़ाने के लिए सहनशीलता का तप परम आवश्यक होता है। सहनशीलता से आत्मबल बढ़ता है। आत्मबल विचारशीलता को बढ़ाती है, जो आनन्द का आधार बनती है। ईश्वर और माया दोनों ही मिलकर संसार के रूप में प्रकट हुये हैं।जो ईश्वर विमुख है वह अपने को माया का अंश मानता है और जो ईश्वर सम्मुख है वह अपने को ईश्वर का अंश मानता है।यही दृष्टिकोण है जो चेतना से उत्पन्न होती है जिसके लिए महापुरुषों की वाणी सहयोग करती है। प्रेम गुणों का पक्षपाती होता है, यही सगुण दृष्टि है। निर्गुण परमात्मा के शिवाय दूसरे को स्वीकार ही नहीं करता है।वह गुण और दोष को माया का ही अंग मानता है।जो माया अर्थात इन्द्रजाल को समझ लेता है उसके लिए ईश्वर ही शेष बचता है।यह बातें विकास खंड मछलीशहर के गांव बामी में विजयदशमी के अवसर पर काशी धर्म पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहीं।

इससे पूर्व उन्होंने गांव में नवनिर्मित बामेश्वर महादेव मंदिर का लोकार्पण किया। मन्दिर के शिलापट्ट का अनावरण करने के पश्चात उन्होंने भक्तगणों से कहा कि उन्होंने इस मन्दिर का नाम बामी के नाम के आधार पर ही ' बामी का ईश्वर' अर्थात बामेश्वर महादेव रखने को कहा था। आपको बताते चलें कि स्वामी जी ने अपनी गुरु शिष्य परम्परा और लोक कल्याण के लिए प्रवचन करने का कार्य 80 के दशक में बामी में ही विशाल यज्ञ करके आरम्भ किया था । आज के कार्यक्रम में बामी सहित क्षेत्र के आस पास के कई गांवों लोग शामिल होकर स्वामी जी के आशीर्वचनों से अभीभूत हुये।

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